मुंबई, दो नवंबर वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा ने नौ नवंबर को दो सबसे महत्वपूर्ण टाटा ट्रस्ट में अपना कार्यकाल समाप्त होने से पहले ट्रस्टी (न्यासी) के रूप में दोबारा चुने जाने की दावेदारी करने से मना किया है। ये दोनों ट्रस्ट सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (एसडीटीटी) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (एसआरट्टटी) हैं। टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा और मुख्य कार्यकारी सिद्धार्थ शर्मा को सोमवार को लिखे एक पत्र में खंबाटा ने कहा कि किसी ट्रस्टी की पुनर्नियुक्ति के लिए साथी न्यासियों के पूर्ण समर्थन की आवश्यकता होती है।
उन्होंने आगे कहा कि अगर वह अपना कार्यकाल जारी रखना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी स्वतंत्रता से समझौता करना पड़ सकता है। गौरतलब है कि देश के सबसे बड़े कारोबारी समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस और इसके सबसे बड़े मालिक टाटा ट्रस्ट के बीच चल रहे लंबे विवाद में टाटा ट्रस्ट के वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह, नोएल के खिलाफ हो गए हैं। यह मतभेद इस साल 17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में खुलकर सामने आया, जिसमें टाटा संस की सूचीबद्धता पर नोएल एकमात्र असहमति जताने वाले व्यक्ति थे और ट्रस्टों के अन्य नामित निदेशक श्रीनिवासन ने बगावत करते हुए टाटा संस का साथ दिया था।
खंबाटा ने अपने चार पन्नों के पत्र में कहा कि टाटा संस का बोर्ड उस तरह से काम नहीं करता जैसा उसने 17 सितंबर को किया था और उन्होंने इस दिन को कलंक का दिन बताया, जिससे टाटा संस की प्रतिष्ठा धूमिल हुई और कॉरपोरेट भारत की छवि भी खतरे में पड़ी। खंबाटा ने कहा कि 28 जुलाई, 2025 के टाटा ट्रस्ट के एक प्रस्ताव के तहत सीआईसी-एनबीएफसी के रूप में अपना पंजीकरण रद्द करने के टाटा संस के आवेदन का समर्थन करने को आरबीआई के साथ बातचीत करने के लिए एन चंद्रशेखरन (टाटा सन्स के चेयरमैन) पर भरोसा जताया गया था, लेकिन उन्होंने होल्डिंग कंपनी द्वारा किए गए प्रयासों पर सवाल उठाए। सूचीबद्धता के आदेश को समूह के सामने एक अस्तित्व से जुड़ा संकट बताते हुए खंबाटा ने इसका विरोध किया।
उन्होंने कहा कि टाटा मॉडल इसलिए सफल रहा क्योंकि यह लोभ या अल्पकालिक लाभ से प्रेरित नहीं था।
स्रोत: एजेंसियां / Asbabe Hindustan Feeds



