अमेरिका में 3 नवंबर को मिड टर्म चुनाव होने वाले हैं। इससे पहले ही अर्ली वोटिंग शुरू हो गई है। अब तक करीब 4 करोड़ लोग वोट डाल चुके हैं। रॉयटर्स और इ्सॉस के सर्वे के मुताबिक अर्ली वोटिंग में राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिक पार्टी पीछे चल रही है। विपक्षी डेमोक्रेट्स को 47% और रिपब्लिकन पार्टी को 36% वोटर्स का समर्थन मिल रहा है। इसी बीच ट्रंप ने अमेरिका के 30 राज्यों से वोटर लिस्ट की मांग की है। माना जा रहा है कि ट्रंप इस डाटा के जरिए विरोधी वोटर्स की पहचान कर उन पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकते हैं।
अर्ली वोटिंग क्या होती है?
दरअसल अमेरिका में चुनाव के तय दिन पहले से ही वोट डालने की सुविधा को अर्ली वोटिंग कहते हैं। वोटर चुनाव वाले दिन का इंतजार किए बिना तय समय के दौरान वोट डाल सकते हैं और इसके लिए वोटर मतदान केंद्र जाते हैं या फिर कुछ राज्यों में डाक से बैलेट भेजकर वोट दे सकते हैं। इसका मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को वोट डालने का मौका देना है। ट्रंप सरकार ने 30 राज्यों से वोटर्स की पूरी जानकारी मांगी है। इस मामले में ट्रंप प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में भी अपील की। इस लिस्ट में वोटर्स के पते, जन्मतिथि और सोशल सिक्योरिटी नंबर जैसी जानकारियां शामिल है। ट्रंप सरकार का कहना है कि वह इसलिए जानकारी चाहती है ताकि पता लगाया जा सके कि कहीं गैर अमेरिकी नागरिक तो वोट नहीं डाल रहे हैं। हालांकि अब तक फर्जी वोटिंग होने का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। जानकारों ने चिंता जताई है कि इस जानकारी का इस्तेमाल ट्रंप के विरोध में वोट डालने वालों की पहचान के लिए हो सकती है। आशंका है कि सरकार इमीग्रेशन एजेंसी आईसीई और एफबीआई के जरिए ऐसे लोगों पर दबाव बनाए।
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अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों की नाराजगी सबसे बड़ी चुनौती
रॉयटर्स और एप्सॉस सर्वे के मुताबिक महंगाई इसकी सबसे बड़ी समस्या है। 65% वोटर ट्रंप के आर्थिक फैसलों से नाराज है। इमीग्रेशन से भी एक बड़ी समस्या है। 48% वोटर्स का मानना है कि सख्त इमीग्रेशन नीतियों से अमेरिका को नुकसान हो रहा है। रोजगार भी एक बड़ी समस्या है। 45% वोटर्स हैं जिनका कहना है कि नौकरी के मौके कम हो रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी चुनाव प्रचार की कमान संभाली है। वो अब तक 50 से ज्यादा चुनावी सभाएं कर चुके हैं। कैलिफोर्निया टेक्सास जैसे राज्यों में ओबामा काफी लोकप्रिय है। भारतवंशी पूर्व उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भी चुनावी सभाएं बढ़ा दी हैं। साल 2024 में राष्ट्रपति चुनाव में वह ट्रंप के खिलाफ डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार थी। मिड टर्म चुनाव में अगर रिपब्लिकन पार्टी हार जाती है तो भी ट्रंप राष्ट्रपति बने रहेंगे। उनका कार्यकाल क्योंकि साल 2028 तक है। हालांकि संसद में बहुमत नहीं रहने पर उनके लिए अपनी नीतियों को लागू करना मुश्किल हो जाएगा। टैरिफ, वीजा और इमीग्रेशन जैसे मुद्दों पर फैसले लेने में भी उन्हें संसद के विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
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कार्यकाल के बाकी 2 साल वह कमजोर राष्ट्रपति बनकर रह सकते हैं
अमेरिकी राजनीति में ऐसी स्थिति को लेम डक कहा जाता है। अगर ट्रंप की पार्टी हारी तो डेमोक्रेट्स उनके खिलाफ और मुखर हो सकते हैं। विपक्षी नेता उनके खिलाफ महाभियोग लाने की बात पहले ही कह चुके हैं। अगर संसद में डेमोक्रेट्स को जरूरी संख्या में सीटें मिलती है तो ट्रंप के लिए मुश्किलें बढ़ना तय है। अमेरिका में करीब 17 करोड़ वोटर हैं। इनमें भारतीय मूल के करीब 25 से 26 लाख लोग वोट देने के योग्य हैं। कार्नेगी एंडोमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक कैलिफोर्निया में सबसे ज्यादा करीब 46,000 भारतीय मूल के वोटर हैं। इसके बाद टेक्सस, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क का नंबर आता है। साल 2024 का एक सर्वे था जिसमें 60% भारतीय मूल के वोटर्स ने कमला हैरिस और 31% ने ट्रंप को समर्थन देने की बात कही।
स्रोत: एजेंसियां / Asbabe Hindustan Feeds



